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गुरुवार, 31 मार्च 2022
रविवार, 20 मार्च 2022
CARTOGRAPHY PROJECTION N ॥ मानचित्र प्रक्षेपण के महत्वपूर्ण परिभाषा एवं इसके अर्थ
Note-∅ का अर्थ थीटा है ।
मानचित्र प्रक्षेपण (CARPTOGRAPHY PROJECTION) :- पृथ्वी अथवा पृथ्वी के किसी बड़े भू - भाग का समतल सतह पर मानचित्र बनाने के लिए ज्यामितीय विधियों के द्वारा निर्मित अक्षांश - देशान्तर रेखाओं के जाल या भू - ग्रिड को मानचित्र प्रक्षेपण कहते है ।
या, पृथ्वी की गोलाकार सतह या उसके किसी भाग को एक चपटी सतह पर किसी स्केल के अनुसार समानान्तर एवं याम्योत्तर रेखाएं खींचकर निरूपित करने की प्रणाली मानचित्र प्रक्षेपण कहलाता है।
या , मानचित्रकला के अन्तर्गत ग्लोब की अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं को समतल धरातल या कागज पर स्थानान्तरित करने की विधि को भी मानचित्र प्रक्षेपण कहा जाता है ।
कार्टोग्राफिक प्रक्षेपण का महत्व (IMPORTANCE OF CARTOGRAPHIC):- मानचित्र प्रक्षेपण, समतल स्थान वाले दीर्घवृत्त भौगोलिक निर्देशांक को बदलने में सहायता करता है। मानचित्र के लिए भिन्न - भिन्न मानचित्र प्रक्षेपण विकसित किए जाते है। प्रत्येक मानचित्र प्रक्षेपण में स्थानिक गुण होते है लेकिन इसके साथ ही अन्य गुणों को त्याग भी दिया जाता है क्योंकि कुछ विरूपण ( Distortion) का सदैव दीर्घवृत्त की सतह से समतल की सतह तक स्थानांतरण होता है । इस प्रकार कोई भी मानचित्र श्रेष्ठ नहीं होता है।
मानचित्र प्रक्षेपण के महत्वपूर्ण पद (IMPORTANT TERMS FOR CARTOGRAPHY PROJECTION):-
1. अक्षांश रेखाएं (LATITUDE LINES)
2. देशांतर रेखाएं(LONGITUDE LINE)
3. याम्योत्तर रेखाएं(MERIDIAN LINES)
4. मानचित्र प्रक्षेपण का आधार(BASE OF CARTOGRAPH).
1.अक्षांश रेखाएं (LATITUDE LINES)
:- पृथ्वी पर भूमध्य रेखा के समानान्तर तथा सभी याम्योत्तर रेखाओं को समकोण पर काटने वाली रेखाओं को अ अक्षांश रेखाएं कहा जाता है । ये रेखाएं समानान्तर रेखाएं भी कहलाती है।
सभी समानान्तर रेखाओं को उसकी भूमध्य रेखा से उत्तरी व दक्षिणी कोणीय दूरी द्वारा पहचाना जाता है यह कोणीय दूरी भूमि - अक्षांश (∅) कहलाती है। भूमध्य रेखा के बिन्दुओं का अक्षांश शून्य होता है, क्योंकि भूमध्य रेखा अक्षांश रेखाओं के लिए संदर्भ रेखा(Reference line) होती है। यदि भूमि की सतह पर बिन्दु भूमध्य रेखा से उत्तर की तरफ लगाए जाए तो ये बिंदु 0⁰ से 90⁰N अक्षांश कहलाते है तथा यदि ये बिन्दु भूमि की सतह पर भूमध्य रेखा से दक्षिण की तरफ लगाएं जाए तो वे 0⁰ से 90⁰S अक्षांश कहलाते है |इस प्रकार 90⁰ N अक्षांश वाला बिंदु उत्तरी ध्रुव पर तथा 90⁰ S अक्षांश वाला बिंदु दक्षिणी ध्रुव पर होगा।
2 . देशान्तर रेखाएं :- देशांतर रेखाओं व याम्योतर रेखाओं के कोणीय मान (∅ ) होते है। पृथ्वी की सतह पर मुख्य याम्योत्तर से पूर्व के बिंदुओ की देशांतर रेखाएं 0⁰ से 180⁰ E होती है। इसी प्रकार मुख्य याम्योत्तर से पश्चिम की तरफ के बिन्दुओं की देशांतर रेखाएं 0⁰ से180⁰ W होती है।
3. याम्योत्तर रेखाएं :- उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक जानेवाली रेखाओं को याम्योत्तर रेखाएं कहा जाता है। ( U K) के ग्रीनविच शहर से निकलने वाली याम्योत्तर रेखा मुख्य याम्योत्तर रेखा या संदर्भ रेखा याम्योत्तर रेखा कहलाती हैं ।
इस रेखा का कोणीय मान "शून्य " माना जाता है।
अन्य सभी याम्योत्तर रेखाओं का कोणीय मान 0⁰ से 180⁰ E तथा 0⁰ से 180⁰ w होता है।
4. मानचित्र प्रक्षेपण का आधार :- किसी गोलाकार वस्तु जैसे पृथ्वी की सतह को बिना किसी विकृति के समतल सतह में विकसित नहीं किया जा सकता है। इसलिए पृथ्वी के बड़े भू - भाग को मानचित्र पर दर्शाने के लिए मापों को किसी रूप में विकृत करना जरूरी है। इन विकृतियों को नियंत्रित करने के लिए पृथ्वी की सतह के बिन्दुओं को किसी समतल अथवा बेलनाकार या शंकु आकार पर प्रक्षेपित करने की आवश्यकता होती है ।
मानचित्र प्रक्षेपणों का वर्गीकरण ( CLASSIFICATION OF CARTOGRAPHY PROJECTION या C.P ) : - मानचित्र प्रक्षेपण कई प्रकार के होते है ः -
1. विकासनीय सतहो के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण (CARTOGRAPHY PROJECTION according to the Developable Method)
2. विचलन विधि के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण (CARTOGRAPHY PROJECTION according to the Deviation Method)
3. ग्लोबल विशेषताओं के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण (C.P according to the Global Properties)
4. दिगंश अथवा समतल के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण (C.P according to Azimuth or plane )
1. विकासनीय सतहो के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण :- विकासनीय सतहो के आधार पर किया गया प्रक्षेप विभाजन अधिक प्रमाणित माना जाता है। मानचित्र या नक्शे चपटे होने के कारण उनमे कुछ आसान प्रक्षेपण ज्यामितीय आकृतियों से बनाएं जाते है जिन्हे उनकी सतहो कों खींचे बिना ही चपट किया जा सकता है। इन्ही सतहों को विकासनीय सतह कहते है ।
इसके अन्तर्गत प्रक्षेपो के निम्न प्रकार है :-
( i ) . शंकु अथवा शांकव प्रक्षेपण (Conical Projection )
( ii ) . बेलनाकार प्रक्षेपण (Cylindrical Projection )
( iii ) . खमध्य प्रक्षेपण (Zenithal Projection)
(iv) . समतलीय या दिगंशी प्रक्षेपण (Azimuthal projection)
1. शंकु अथवा शांकव प्रक्षेपण :- ग्लोब को शंकु की सहायता से इस प्रकार ढका जाता है कि शंकु किसी एक अक्षांश पर ही ग्लोब को चारो ओर स्पर्श करता हो लेकिन ध्रुव तथा विषुवत रेखा पर शंकु का स्पर्श करना सम्भव नहीं होता ये विषम परिस्थितियां होती है।
2. बेलनाकार प्रक्षेपण :- इस प्रणाली में बेलन द्वारा ग्लोब को इस प्रकार ढक दिया जाता है कि बेलन ग्लोब को विषवत रेखा पर चारों तरफ स्पर्श करता है।
3. खमध्य प्रक्षेपण :- इस प्रकार के प्रक्षेपण में समतल धरातल पर ही प्रतिबिम्ब लिया जाता है यह धरातल ग्लोब को किसी एक बिंदु पर स्पर्श करता है तथा द्युतिमान बिंदु से इस पर प्रकाश डालकर अक्षांश व देशान्तर रेखाओं का जाल प्राप्त किया जाता है।
4. समतलीय या दिगंशी प्रक्षेपण :- इस प्रकार के प्रक्षेपो पर अंकित मानचित्रों की दिशाएं शुद्ध होती है। इसमें मानचित्र के केन्द्र बिन्दु से चारो ओर की दिशाएं ,पृथ्वी पर स्थित दिशाओं के समान ही होती है। यह केन्द्र बिंदु यदि कोई ध्रुव है तो देशान्तर रेखाएं शुद्ध दिशाएं दर्शाती है।
2. विचलन विधि के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण
(i) . परिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण (Perspective Projection) :-
( ii ) . अपरिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण (Non-Perspective Projection)
(iii). गणितीय प्रक्षेपण (Mathematical Projection)
( i ) . परिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण :- एक ग्लोब की समानान्तर व याम्योत्तर रेखाओं के प्रतिबिम्बो के जाल को किसी विकासनीय सतह पर प्रक्षेपित कर प्राप्त किया जाता है , तो उसे परिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण कहा जाता है।
( ii) . अपरिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण :- यदि ग्लोब पर समानान्तर व याम्योत्तर रेखाओं के प्रतिबिम्बों के जाल स्थापित करने या बनाने वाली रेखाओं को सीधा अथवा वक्र किया जाए तथा समतुल्य परिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण प्राप्त करने के लिए समानान्तर या अक्षांशो व याम्योत्तर रेखाओं के मध्य अन्तर घटाया या बढाया जाए तो इस प्रकार प्राप्त होने वाले प्रक्षेपणों को अपरिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण कहा जाता है
(iii ) . गणितीय प्रक्षेपण :- इन्हे परम्परागत प्रक्षेपण (Conventional Projection) भी कहा जाता है। इन्हें गणितीय गणना अथवा सुत्रो भी सहायता से प्राप्त किया जा सकता है। इन प्रक्षेपणो का प्रक्षेपित प्रतिबिम्बों से बहुत कम सम्बन्ध होता है ।
3. ग्लोबल विशेषताओं के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण :- इसको निम्न प्रकार से वर्गीकृत किये जा सकते है। -
(i) सदृश्य प्रक्षेपण (Conformal Projection)
(ii ) सम क्षेत्रफल प्रक्षेपण ( Equal Area Projection)
( iii ) समान दूरी प्रक्षेपण ( Equidistant projection)
( iv) . दिगंश प्रक्षेपण ( Azimuth Projection)
(i). सदृश्य प्रक्षेपण :- सदृश्य प्रक्षेपणों में किन्ही दो छोटी रेखाओं के जोड़ों के बीच कोण बिल्कुल सही दर्शाए जाते हैं इसलिए क्षेत्रफल की आकृति सही प्रतित होती है। यह प्रक्रिया केवल छोटे क्षेत्रफलों के लिए उपयुक्त है क्योंकि बड़े क्षेत्रो में स्केल परिवर्तन के कारण विकृति , उत्पन्न हो जाती है ।
( ii ) . सम क्षेत्रफल प्रक्षेपण :- इस प्रकार के प्रक्षेपणों में क्षेत्रफल सही दर्शाए जाते है । सापेक्ष क्षेत्रफल समान ही रहते है । लेकिन उनकी आकृति या आकार समान नहीं रहते है । इन प्रक्षेपणों के रेखा जाल पर बने हुए अक्षांश - देशांतरीय चतुर्भुज का क्षेत्रफल , ग्लोब पर प्रदर्शित होने वाले संगति चतुभुर्ज के क्षेत्रफल से माप के अनुपात मे समान होता है, लेकिन इन प्रक्षेपणों के रेख जाल पर खींचे हुए मानचित्रों की आकृति विकृत हो जाती है |
(iii) . समान दूर प्रक्षेपण :- इस प्रकार के प्रक्षेपणों में किसी एक केन्द्रीय बिंदु से नक्शे के अन्य बिंदुओं के बीच की दूरियां सही दर्शाई जाती है। इनके द्वारा खींचे गऐ मानचित्रों की आकृति भी शुद्ध होती है। मानचित्र की आकृति को शुद्ध रखने के लिए अक्षांश व देशान्तर रेखाओं का परस्पर लम्बवत् होना आवश्यक है । किसी भी बिंदु पर मापक , समस्त दिशाओं में समान होता है लेकिन यह मापक एक बिन्दु से दूसरे बिन्द पर अलग हो जाता है।
(iv) . दिगंश प्रक्षेपण :- इस प्रकार के प्रक्षेपणों पर अंकित मानचित्रों की दिशाएं शुद्ध होती है तथा ये प्रक्षेपण नौ सेना के द्वारा काम में लाया जाता है।
विभिन्न प्रकार के प्रक्षेपणों की विशेषताएं (FEATURES OF VARIOUS TYPES OF PROJECTION)
1. क्षेत्रफल (Area) :- कई विभिन्न प्रक्षेप समान क्षेत्रफल वाले प्रक्षेप कहलाते है । ये प्रक्षेप इस प्रकार बनाए जाते है कि वे किसी आकृति का समान क्षेत्रफल दर्शाए । ये प्रक्षेप , किसी क्षेत्र - विशेष में अनाज उगाने के लिए कितने क्षेत्रफल का उपयोग किया गया है यह पता लगाने के लिए किया जाता है । ये समान क्षेत्रफल वाले नक्शे घुमावदार नक्शे कहलाते है।
2. आकार :- सही आकृति बताने वाले नक्शो के प्रक्षेप एक समय में पृथ्वी के बहुत कम क्षेत्र को प्रदर्शित करते है। पृथ्वी के लक्ष्यों की सही आकृति प्रदर्शित करने वाले नक्शो के प्रक्षेप अनुरुपक प्रक्षेप (Conformal Projection) कहलाते हैं।
3. दिशा (DIRECTION ) :- नक्शे प्रक्षेपण की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता ' दिशा ' होती है । ग्लोब के अलावा दो बिंदुओं के बीच न्यूनतम दूरी एक सरल रेखा होती है । यह सरल रेखा ग्लोब पर ग्लोब की वक्रता के कारण वक्राकार होती हैं। एक ऐसी वक्राकार रेखा जो एक बड़ा वृत्त होती है तथा पृथ्वी को दो बराबर भागों में विभाजित करती हैं, बडा . वृत कहलाती ( Great Circle )है ।
4. दूरी ( DISTANCE):- समान दूरी नक्शे अथवा पृथ्वी की सतह पर समान दूरी दर्शने वाले नक्शे , यात्रा करने वाले लोगो के लिए महत्वपूर्ण होते है |
मंगलवार, 8 मार्च 2022
समोच्च रेखा सर्वेक्षण //. Contour surveying pdf and all note or theory copy ready to exam. 2022 sessinal exam
समोच्च रेखा (Contour)किसे कहते है ?
:- समोच्च रेख एक ऐसी काल्पनिक रेखा है जो भूमि पर सम - ऊंचाई के बिन्दुओं को जोड़ती है। या , यह एक ऐसी रेखा है जिसमें एक समतल सतह जमीन की सतह को काटता है ।
जैसें :- किसी भी तालाब के किनारे पर पानी की रेख एक ही ऊँचाई की समतल रेख होती है।
समोच्च रेखान्तर किसे कहते है?
:- दो क्रमागत समोच्च रेखाओं के बीच ऊर्ध्वाधर दूरी को समोच्च रेखान्तर कहते है ।
नोट :- एक समोच्च नक्शे पर समोच्च रेखान्तर की एक समान रखा जाता है, अन्यथा वह नक्शा जमीन की आकृतियो का सही चित्रण नहीं करेगा ।
दो क्रमागत समोच्च रेखाओं पर स्थिर किन्ही दो बिंदु A व B के बीच की क्षैतिज दूरी क्षैतिज अन्तर कहलाता है। इस क्षैतिज अन्तर का मान उन दो बिन्दुओं ( A व B ) के बीच की जमीन के ढाल पर निर्भर करता है। यदि ढाल ज्यादा है तो यह अन्तर कम होगा, व यदि ढाल कम है तो यह अन्तर ज्यादा होगा ।
** समोच्च रेखान्तर (Contour Interval)का चयन निम्न पहलुओ पर निर्भर करता है।**
* भूमि का स्वरूप (Nature of the ground):- समोच्च रेखान्तर इस बात पर निर्भर करता है कि जमीन सपाट है या ऊबड़ - खाबड़ है । इस सपाट जमीन के लिए लिया गया रेखान्तर ऊबड़ - खाबड़ जमीन के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं रहेगा । सपाट जमीन के लिए समोच्च रेखान्तर बहुत छोटा लिया जाता है जबकी ऊबड़ - खाबड़ या असम जमीन के लिए बड़े रेखान्तर की जरूरत रहेगी अन्यथा समोच्च रेखाएँ एक - दूसरे के बहुत पास - पास आ जायेंगी ।
**नक्शे का पैमाना(Scale of the map) :- समोच्च रेखान्तर पैमाने के विलोमानुपाती होना चाहिए । यदि पैमाना छोटा है तो रेखान्तर बड़ा होना चाहिए , व यदि पैमाना बड़ा हो तो रेखन्तर छोटा होना चाहिए ।






