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रविवार, 20 मार्च 2022

CARTOGRAPHY PROJECTION N ॥ मानचित्र प्रक्षेपण के महत्वपूर्ण परिभाषा एवं इसके अर्थ


Note-∅ का अर्थ थीटा है ।



मानचित्र प्रक्षेपण (CARPTOGRAPHY PROJECTION)  :- पृथ्वी अथवा पृथ्वी के किसी बड़े भू - भाग का समतल सतह पर मानचित्र बनाने के लिए ज्यामितीय विधियों के द्वारा निर्मित अक्षांश - देशान्तर रेखाओं के जाल या भू - ग्रिड को मानचित्र प्रक्षेपण कहते है ।

              या, पृथ्वी की गोलाकार सतह या उसके किसी भाग को एक चपटी सतह पर किसी स्केल के अनुसार समानान्तर एवं याम्योत्तर रेखाएं खींचकर निरूपित करने की प्रणाली मानचित्र प्रक्षेपण कहलाता है।

  या , मानचित्रकला के अन्तर्गत ग्लोब की अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं को समतल धरातल या कागज पर स्थानान्तरित करने की विधि को भी मानचित्र प्रक्षेपण कहा जाता है ।


कार्टोग्राफिक प्रक्षेपण का महत्व (IMPORTANCE OF CARTOGRAPHIC):- मानचित्र प्रक्षेपण, समतल स्थान वाले दीर्घवृत्त भौगोलिक निर्देशांक को बदलने में सहायता करता है। मानचित्र के लिए भिन्न - भिन्न मानचित्र प्रक्षेपण विकसित किए जाते है। प्रत्येक मानचित्र प्रक्षेपण में स्थानिक गुण होते है लेकिन इसके साथ ही अन्य गुणों को त्याग भी दिया जाता है क्योंकि कुछ विरूपण ( Distortion) का सदैव दीर्घवृत्त की सतह से समतल की सतह तक स्थानांतरण होता है । इस प्रकार कोई भी मानचित्र श्रेष्ठ नहीं होता है।

मानचित्र प्रक्षेपण के महत्वपूर्ण पद (IMPORTANT TERMS FOR CARTOGRAPHY PROJECTION):-

1. अक्षांश रेखाएं (LATITUDE LINES)

2. देशांतर रेखाएं(LONGITUDE LINE)

3. याम्योत्तर रेखाएं(MERIDIAN LINES)

4. मानचित्र प्रक्षेपण का आधार(BASE OF CARTOGRAPH).

 

1.अक्षांश रेखाएं (LATITUDE LINES)

 :- पृथ्वी पर भूमध्य रेखा के समानान्तर तथा सभी याम्योत्तर रेखाओं को समकोण पर काटने वाली रेखाओं को अ अक्षांश रेखाएं कहा जाता है । ये रेखाएं समानान्तर रेखाएं भी कहलाती है।
          सभी समानान्तर रेखाओं को उसकी भूमध्य रेखा से उत्तरी व दक्षिणी कोणीय दूरी द्वारा पहचाना जाता है यह कोणीय दूरी भूमि - अक्षांश (∅) कहलाती है। भूमध्य रेखा के बिन्दुओं का अक्षांश शून्य होता है, क्योंकि भूमध्य रेखा अक्षांश रेखाओं के लिए संदर्भ रेखा(Reference line) होती है। यदि भूमि की सतह पर बिन्दु भूमध्य रेखा से उत्तर की तरफ लगाए जाए तो ये बिंदु 0⁰ से 90⁰N अक्षांश कहलाते है तथा यदि ये बिन्दु भूमि की सतह पर भूमध्य रेखा से दक्षिण की तरफ लगाएं जाए तो वे 0⁰ से 90⁰S अक्षांश कहलाते है |इस प्रकार 90⁰ N अक्षांश वाला बिंदु उत्तरी ध्रुव पर तथा 90⁰ S अक्षांश वाला बिंदु दक्षिणी ध्रुव पर होगा।


2 . देशान्तर रेखाएं :- देशांतर रेखाओं व याम्योतर रेखाओं के कोणीय मान (∅ ) होते है। पृथ्वी की सतह पर मुख्य याम्योत्तर से पूर्व के बिंदुओ की देशांतर रेखाएं 0⁰ से 180⁰ E होती है। इसी प्रकार मुख्य याम्योत्तर से पश्चिम की तरफ के बिन्दुओं की देशांतर रेखाएं 0⁰ से180⁰ W होती है।

3. याम्योत्तर रेखाएं :- उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक जानेवाली रेखाओं को याम्योत्तर रेखाएं कहा जाता है। ( U K) के ग्रीनविच शहर से निकलने वाली याम्योत्तर रेखा मुख्य याम्योत्तर रेखा या संदर्भ रेखा याम्योत्तर रेखा कहलाती हैं ।

इस रेखा का कोणीय मान "शून्य " माना जाता है।
अन्य सभी याम्योत्तर रेखाओं का कोणीय मान 0⁰ से 180⁰ E तथा 0⁰ से 180⁰ w होता है।

4. मानचित्र प्रक्षेपण का आधार :- किसी गोलाकार वस्तु जैसे पृथ्वी की सतह को बिना किसी विकृति के समतल सतह में विकसित नहीं किया जा सकता है। इसलिए पृथ्वी के बड़े भू - भाग को मानचित्र पर दर्शाने के लिए मापों को किसी रूप में विकृत करना जरूरी है। इन विकृतियों को नियंत्रित करने के लिए पृथ्वी की सतह के बिन्दुओं को किसी समतल अथवा बेलनाकार या शंकु आकार पर प्रक्षेपित करने की आवश्यकता होती है ।

मानचित्र प्रक्षेपणों का वर्गीकरण ( CLASSIFICATION OF CARTOGRAPHY PROJECTION या C.P ) : - मानचित्र प्रक्षेपण कई प्रकार के होते है   ः -

1. विकासनीय सतहो के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण (CARTOGRAPHY PROJECTION according to the Developable Method)

2. विचलन विधि के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण (CARTOGRAPHY PROJECTION according to the Deviation Method)

3. ग्लोबल विशेषताओं के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण (C.P according to the Global Properties)

4. दिगंश अथवा समतल के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण    (C.P according to Azimuth or plane )

1. विकासनीय सतहो के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण :- विकासनीय सतहो के आधार पर किया गया प्रक्षेप विभाजन अधिक प्रमाणित माना जाता है। मानचित्र या नक्शे चपटे होने के कारण उनमे कुछ आसान प्रक्षेपण ज्यामितीय आकृतियों से बनाएं जाते है जिन्हे उनकी सतहो कों खींचे बिना ही चपट किया जा सकता है। इन्ही सतहों को विकासनीय सतह कहते है ।

इसके अन्तर्गत प्रक्षेपो के निम्न प्रकार है :-

( i ) . शंकु अथवा शांकव प्रक्षेपण (Conical Projection )
( ii ) . बेलनाकार प्रक्षेपण (Cylindrical Projection )
( iii ) . खमध्य प्रक्षेपण (Zenithal Projection)
(iv) . समतलीय या दिगंशी प्रक्षेपण (Azimuthal projection)



1. शंकु अथवा शांकव प्रक्षेपण :- ग्लोब को शंकु की सहायता से इस प्रकार ढका जाता है कि शंकु किसी एक अक्षांश पर ही ग्लोब को चारो ओर स्पर्श करता हो लेकिन ध्रुव तथा विषुवत रेखा पर शंकु का स्पर्श करना सम्भव नहीं होता  ये विषम परिस्थितियां होती है।


2. बेलनाकार प्रक्षेपण :- इस प्रणाली में बेलन द्वारा ग्लोब को इस प्रकार ढक दिया जाता है कि बेलन ग्लोब को विषवत रेखा पर चारों तरफ स्पर्श करता है।

3. खमध्य प्रक्षेपण :- इस प्रकार के प्रक्षेपण में समतल धरातल पर ही प्रतिबिम्ब लिया जाता है यह धरातल ग्लोब को किसी एक बिंदु पर स्पर्श करता है तथा द्युतिमान बिंदु से इस पर प्रकाश डालकर अक्षांश व देशान्तर रेखाओं का जाल प्राप्त किया जाता है।


4. समतलीय या दिगंशी प्रक्षेपण :- इस प्रकार के प्रक्षेपो पर अंकित मानचित्रों की दिशाएं शुद्ध होती है। इसमें मानचित्र के केन्द्र बिन्दु से चारो ओर की दिशाएं ,पृथ्वी पर स्थित दिशाओं के समान ही होती है। यह केन्द्र बिंदु यदि कोई ध्रुव है तो देशान्तर रेखाएं शुद्ध दिशाएं दर्शाती है।


2. विचलन विधि के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण 

(i) . परिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण (Perspective Projection) :-

( ii ) . अपरिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण (Non-Perspective Projection)

(iii). गणितीय प्रक्षेपण (Mathematical Projection)

( i ) . परिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण :- एक ग्लोब की समानान्तर व याम्योत्तर रेखाओं के प्रतिबिम्बो के जाल को किसी विकासनीय सतह पर प्रक्षेपित कर प्राप्त किया जाता है , तो उसे परिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण कहा जाता है।

( ii) . अपरिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण :- यदि ग्लोब पर समानान्तर व याम्योत्तर रेखाओं के प्रतिबिम्बों के जाल स्थापित करने या बनाने वाली रेखाओं को सीधा अथवा वक्र किया जाए तथा समतुल्य परिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण प्राप्त करने के लिए समानान्तर या अक्षांशो व याम्योत्तर रेखाओं के मध्य अन्तर घटाया या बढाया जाए तो इस प्रकार प्राप्त होने वाले प्रक्षेपणों को अपरिप्रेक्ष्य प्रक्षेपण कहा जाता है

(iii ) . गणितीय प्रक्षेपण :- इन्हे परम्परागत प्रक्षेपण (Conventional Projection) भी कहा जाता है। इन्हें गणितीय गणना अथवा सुत्रो भी सहायता से प्राप्त किया जा सकता है। इन प्रक्षेपणो का प्रक्षेपित प्रतिबिम्बों से बहुत कम सम्बन्ध होता है ।

3. ग्लोबल विशेषताओं के आधार पर मानचित्र प्रक्षेपण :- इसको निम्न प्रकार से वर्गीकृत किये जा सकते है। -

(i) सदृश्य प्रक्षेपण (Conformal Projection)

(ii ) सम क्षेत्रफल प्रक्षेपण ( Equal Area Projection)

( iii ) समान दूरी प्रक्षेपण ( Equidistant projection)

( iv) . दिगंश प्रक्षेपण ( Azimuth Projection)

(i). सदृश्य प्रक्षेपण :- सदृश्य प्रक्षेपणों में किन्ही दो छोटी रेखाओं के जोड़ों के बीच कोण बिल्कुल सही दर्शाए जाते हैं इसलिए क्षेत्रफल की आकृति सही प्रतित होती है। यह प्रक्रिया केवल छोटे क्षेत्रफलों के लिए उपयुक्त है क्योंकि बड़े क्षेत्रो में स्केल परिवर्तन के कारण विकृति , उत्पन्न हो जाती है ।

( ii ) . सम क्षेत्रफल प्रक्षेपण :- इस प्रकार के प्रक्षेपणों में क्षेत्रफल सही दर्शाए जाते है । सापेक्ष क्षेत्रफल समान ही रहते है । लेकिन उनकी आकृति या आकार समान नहीं रहते है । इन प्रक्षेपणों के रेखा जाल पर बने हुए अक्षांश - देशांतरीय चतुर्भुज का क्षेत्रफल , ग्लोब पर प्रदर्शित होने वाले संगति चतुभुर्ज के क्षेत्रफल से माप के अनुपात मे समान होता है, लेकिन इन प्रक्षेपणों के रेख जाल पर खींचे हुए मानचित्रों की आकृति विकृत हो जाती है |

(iii) . समान दूर प्रक्षेपण :- इस प्रकार के प्रक्षेपणों में किसी एक केन्द्रीय बिंदु से नक्शे के अन्य बिंदुओं के बीच की दूरियां सही दर्शाई जाती है। इनके द्वारा खींचे गऐ मानचित्रों की आकृति भी शुद्ध होती है। मानचित्र की आकृति को शुद्ध रखने के लिए अक्षांश व देशान्तर रेखाओं का परस्पर लम्बवत् होना आवश्यक है । किसी भी बिंदु पर मापक , समस्त दिशाओं में समान होता है लेकिन यह मापक एक बिन्दु से दूसरे बिन्द पर अलग हो जाता है।

(iv) . दिगंश प्रक्षेपण :- इस प्रकार के प्रक्षेपणों पर अंकित मानचित्रों की दिशाएं शुद्ध होती है तथा ये प्रक्षेपण नौ सेना के द्वारा काम में लाया जाता है।


विभिन्न प्रकार के प्रक्षेपणों की विशेषताएं (FEATURES OF VARIOUS TYPES OF PROJECTION)

1. क्षेत्रफल (Area) :- कई विभिन्न प्रक्षेप समान क्षेत्रफल वाले प्रक्षेप कहलाते है । ये प्रक्षेप इस प्रकार बनाए जाते है कि वे किसी आकृति का समान क्षेत्रफल दर्शाए । ये प्रक्षेप , किसी क्षेत्र - विशेष में अनाज उगाने के लिए कितने क्षेत्रफल का उपयोग किया गया है यह पता लगाने के लिए किया जाता है । ये समान क्षेत्रफल वाले नक्शे घुमावदार नक्शे कहलाते है।

2. आकार :- सही आकृति बताने वाले नक्शो के प्रक्षेप एक समय में पृथ्वी के बहुत कम क्षेत्र को प्रदर्शित करते है। पृथ्वी के लक्ष्यों की सही आकृति प्रदर्शित करने वाले नक्शो के प्रक्षेप अनुरुपक प्रक्षेप (Conformal Projection) कहलाते हैं।

3. दिशा (DIRECTION ) :- नक्शे प्रक्षेपण की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता ' दिशा ' होती है । ग्लोब के अलावा दो बिंदुओं के बीच न्यूनतम दूरी एक सरल रेखा होती है । यह सरल रेखा ग्लोब पर ग्लोब की वक्रता के कारण वक्राकार होती हैं। एक ऐसी वक्राकार रेखा जो एक बड़ा वृत्त होती है तथा पृथ्वी को दो बराबर भागों में विभाजित करती हैं, बडा . वृत कहलाती ( Great Circle )है ।

4. दूरी ( DISTANCE):- समान दूरी नक्शे अथवा पृथ्वी की सतह पर समान दूरी दर्शने वाले नक्शे , यात्रा करने वाले लोगो के लिए महत्वपूर्ण होते है |



















मंगलवार, 8 मार्च 2022

समोच्च रेखा सर्वेक्षण //. Contour surveying pdf and all note or theory copy ready to exam. 2022 sessinal exam

  समोच्च रेखा (Contour)किसे कहते है ?

 :- समोच्च रेख एक ऐसी काल्पनिक रेखा है जो भूमि पर सम - ऊंचाई के बिन्दुओं को जोड़ती है। या , यह एक ऐसी रेखा है जिसमें एक समतल सतह जमीन की सतह को काटता है ।
जैसें :- किसी भी तालाब के किनारे पर पानी की रेख एक ही ऊँचाई की समतल रेख होती है।




समोच्च रेखान्तर किसे कहते है?

:- दो क्रमागत समोच्च रेखाओं के बीच ऊर्ध्वाधर दूरी को समोच्च रेखान्तर कहते है ।

       नोट :- एक समोच्च नक्शे पर समोच्च रेखान्तर की एक समान रखा जाता है, अन्यथा वह नक्शा जमीन की आकृतियो का सही चित्रण नहीं करेगा ।

       दो क्रमागत समोच्च रेखाओं पर स्थिर किन्ही दो बिंदु A व B के बीच की क्षैतिज दूरी क्षैतिज अन्तर कहलाता है। इस क्षैतिज अन्तर का मान उन दो बिन्दुओं ( A व B ) के बीच की जमीन के ढाल पर निर्भर करता है। यदि ढाल ज्यादा है तो यह अन्तर कम होगा, व यदि ढाल कम है तो यह अन्तर ज्यादा होगा ।



** समोच्च रेखान्तर (Contour Interval)का चयन निम्न पहलुओ पर निर्भर करता है।**

* भूमि का स्वरूप (Nature of the ground):- समोच्च रेखान्तर इस बात पर निर्भर करता है कि जमीन सपाट है या ऊबड़ - खाबड़ है । इस सपाट जमीन के लिए लिया गया रेखान्तर ऊबड़ - खाबड़ जमीन के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं रहेगा । सपाट जमीन के लिए समोच्च रेखान्तर बहुत छोटा लिया जाता है जबकी ऊबड़ - खाबड़ या असम जमीन के लिए बड़े रेखान्तर की जरूरत रहेगी अन्यथा समोच्च रेखाएँ एक - दूसरे के बहुत पास - पास आ जायेंगी ।


**नक्शे का पैमाना(Scale of the map) :- समोच्च रेखान्तर पैमाने के विलोमानुपाती होना चाहिए । यदि पैमाना छोटा है तो रेखान्तर बड़ा होना चाहिए , व यदि पैमाना बड़ा हो तो रेखन्तर छोटा होना चाहिए ।


** सर्वेक्षण था उद्देश्य व उसका विस्तार(Purpose and extent of the survey) :- समोच्च रेखान्तर खासकर सर्वेक्षण के उद्देश्य व उसके विस्तार पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, यदि सर्वेक्षण विस्तृत डिजाइन कार्य के लिए या मिट्टी के काम की परिशुद्ध गणना के लिए है तो छोटा रेखान्तर काम में लाना चाहिए । इसके लिए सर्वेक्षण का विस्तार भी छोटा भी होगा । किन्तु सड़क तथा रेल पथों के सर्वेक्षण के लिए या जलाशय व जल - निकास क्षेत्र आदि के सर्वेक्षण में समोच्च रेखान्तर बड़ा लिया जाता है।


** क्षेत्रकार्य के लिए निर्धारित समय व खर्च(Time and expense of field work) :- यदि सर्वेक्षण का निर्धारित समय कम हो तो समोच्च रेखान्तर बड़ा लेना चाहिए । यदि रेखान्तर छोटा हो तो क्षेत्र सर्वेक्षण व नक्शे के आलेखन मे ज्यादा समय लगेगा।




साधारण स्थालाकृतिक सर्वेक्षण में निम्न नियम अपनाया जा सकता है :-


समोच्च रेखान्तर =  25 ( मीटर ) / पैमाना ( cm / Km )


या, 

समोच्च रेखान्तर = 50 (फुट) / पैमाना ( inch / mile )


समोच्च रेखाओं की विशिष्टताएं (Characteristics of contours) :-

समोच्च नक्शा (Contour map) बनाने समय समोच्च रेखाओं की निम्न विशिष्टताएं ध्यान में रखनी चाहिए ।

1. दो असमान ऊंचाई की समोच्च रेखाएँ आपस मे एक- दूसरे को नहीं काट सकती | यदि वे एक - दूसरे को कांटे तो प्रतिच्छदन बिंदु की दो ऊंचाइयां  , जोकि असम्भव है । किन्त एक प्रलम्बी शैल (Overhanging cliff) या गुफा की ति में समोच्च रेखाएँ एक दूसरे को काट सकती है। ( चित्र 6.2 )



2. असमान ऊँचाइयो की समोच्च रेखाएं आपस में मिलकर एक समोच्च रेखा सिर्फ एक ऊर्ध्वाधर खड़ी शैल की स्थिति में ही बन सकती है, अन्यथा नहीं।

3. यदि समोच्च रेखाएँ एक - दूसरे के अधिक पास हो तो वे अधिक ढाल को प्रदर्शित करती है। यदि समोच्च रेखाएँ सीधी हो और बराबर की दूरी पर समानान्तर हों तो वे एक समतल पृष्ठ का द्योतक होती है। इस प्रकार चित्र में, A -A एक अधिक ढाल प्रदर्शित करता हैं , B-B एक कम ढ़ाल प्रदर्शित करता है , C-C एक सम ढाल प्रदर्शित करता है व D-D एक समतल पृष्ठ का द्योतक है। (चित्र 6.3 )





4. एक बिंदु से गुजरने वाली समोच्च रेखा उस बिंदु पर अधिकतर ढाल की दिश के अभिलम्ब होती है । यह विशिष्टता (2) की सहमति से है क्योंकि समोच्च रेखओ के बीच लम्ब - दूरी उनके बीच कम से कम दूरी के बराबर होती है।

5. एक संवृत समोच्च रेखा के घेरे के अन्दर यदि एक या अधिक समोच्च रेखाएँ हो जिनकी ऊंचाई अन्दर की ओर बढ़ रही हो तो वह एक पहाड़ी को प्रदर्शित करती है चित्र - - - - ( a ) । उसी तरह यदि ऊंचाई अन्दर की ओर कम हो रही हो तो वह तालाब , झील या गर्त का द्योतक होती है ( चित्र 6.4 )


6. दो समान ऊंचाई की समोच्च रेखाएँ आपस में मिलकर एक नहीं हो सकती । उसी तरह एक समोच्च रेखा दो समोच्च रेखाओं मे नहीं बंट सकती है क्योंकि ऐसा होने पर वे एक तीक्ष्णधार वाली पहाड़ी या गर्त की द्योतक होंगी जोकि प्रकृति में सम्भव नही है। हां , एक ही ऊंचाई की दो समोच्च रेखाएँ एक दूसरे के बहुत पास आ सकते है।


7. हर समोच्च रेखा संवृत होनी चाहिए अथवा स्वयं मे बन्द होनी चाहिए चाहे ऐसा नक्शे की सीमा के भीतर भले ही न हो ।

8. समोच्च रेखा एक जल विभाजक रेखा (Water shed line) या काठी रेखा(Ridge line) को समकोण पर पार करती है। ऐसा करते समय ये U - नुमा वक्र बनाती है जिनका अवतल पार्श्व(Concave side) ऊँची भूमि की ओर होता है । चित्र (6.5) ।




9. उसी तरह समोच्च रेखाएँ एक घाटी रेखा ( valley line ) को अभिलम्ब काटती है। ऐसा करते समय वे एक तीव्र v वक्र बनाती है जिनका उत्तल - पार्श्व ( convex side ) ऊंची भूमि की ओर होता है। चित्र ( 6. 6 )




10. हर समोच्च रेखा काठी ( या घाटी ) के दोनो ओर होती है , क्योंकि ऊँचे से ऊँचा क्षैतिज समतल भी , जोकि काठी को प्रतिच्छेदित करता है, उसे दोनों ओर काटता हैं ; उसी तरह सबसे नीचा क्षैतिज समतल भी घाटी को दोनो ओर काटता है ।



समोच्च रेखा सर्वेक्षण की विधियाँ(Methods of Contouring):-

एक स्थलाकृति सर्वेक्षण में किसी बिन्दु की स्थिति निर्धारित के लिए क्षैतिज नियंत्रण एवं ऊर्ध्वाधर नियंतण दोनो की आवश्यकता पड़ती है। एक समोच्च रेखा के सर्वेक्षण की विधि काम में लाये जाने वाले उपकरण पर निर्भर करती है। ये विधियाँ साधारणत: दो पद्धतियों में विभाजित की जा सकती है।

(a). सीधी पद्धति ( Direct Method) 

(b). परोक्ष पद्धति ( Indirect method )

(a) . सीधी पद्धति(Direct Method) :- इस विधि में जिन समोच्च रेखाओं का सर्वेक्षण करना होता है उनका वास्तविक रूप मे जमीन पर अनुरेखण(Trace) किया जाता है। इस प्रकार इस विधि में उन्ही विशिष्ट बिन्दुओं के माप लिए जाते हैं। जिनका नक्शे पर आलेखन कर समोच्च रेखाएँ बनाई जाती है। अत: इस क्रियाविधि को कभी - कभी ' समोच्च रेखा अनुरेखण ' भी कहते है।

 क्षेत्र कार्य को दो भागों में विभाजित किया जाता है ।

( i ) ऊर्धाधर नियत्रंण ( Vertical control) :- समोच्च रेखा पर बिन्दुओं को लगाना ।

(ii) . क्षैतिज नियत्रंण (Horizontal Control) :- इन बिन्दुओं का सर्वेक्षण कर उनकी क्षैतिज स्थिति निर्धारित करना।

( i) . ऊर्ध्वाधर नियत्रंण (Vertical Control):- समोच्च रेखा पर स्थित बिन्दुओं की खोज एक लेवल व गज की सहायता से या एफ हैंड लेवल की सहायता से की जाती है। लेवल को ऐसी जगह स्थापित किया जाता हैं जहां से ज्यादा क्षेत्र दिख सके | गज को तल चिह्न पर रखकर पश्चावलोकन लिया जाता है और इस प्रकार लेवल के अक्ष का समानीत तल ज्ञात किया जाता है।( चित्र -6.7)

(ii) . क्षैतिज नियत्रण(Horizontal Control) :- समोच्च रेखाओं पर बिन्दुओं को लगाने के पश्चात् उनका सर्वेक्षण किसी उचित क्षैतिज नियतंत्र प्रणाली से किया जाता है। यह नियत्रंण प्रणाली मुख्यतः क्षेत्र की रूपरेखा व उसके विस्तार पर निर्भर करती है। यदि क्षेत्र छोटा हो तो जरीब सर्वेक्षण द्वारा ही इन बिंदुओं की स्थिति निर्धारित की जा सकती है। यदि क्षेत्र बड़ा हो तो मालारेखा सर्वेक्षण द्वारा इन बिंदुओ की स्थिति नर्धारित की जा सकती है ।

( b). परोक्ष पद्धतियां (Indirect Method):- इस पद्धति मे सीधी रेखाओं की किसी प्रणाली पर कुछ निर्देश बिंदु (Interpolation)लिये जाते हैं। और फिर उनकी ऊंचाई ज्ञात की जाती है । इन बिंदुओं का आलेखन किया जाता है और फिर अन्तर्वेशन द्वारा समोच्च रेखाएँ  जाती है । ये निर्देश बिंदु साधारणतः समोच्च रेखाओं पर स्थित नही होते। अन्तर्वेशन के समय यह मान लिया जाता है कि दो संलग्न निर्देश बिंदुओं के बीच ढाल एकसार(Uniform) है ।

निर्देश बिन्दुओं की स्थिति निर्धारण की कुछ विधियाँ नीचे दी जा रही है।

1. वर्गो द्वारा ( By squares ) :- यह विधि तब अपनाई जाती है जबकी क्षेत्र छोटा हो व जमीन ज्यादा ऊबड़ - खाबड़ न हो । सर्वेक्षण क्षेत्र को कई वर्गो में बाँटा जाता है। वर्ग का माप , जमीन की आकृति व समोच्च रेवान्तर के आधार पर 5m व 20 m के बीच रखा जाता है। एक लेवल व गज की सहायता से वर्गों के कोनो का समानीत तल ज्ञात किया जाता है और फिर आलेखन के समय अन्तर्वेशन द्वारा समोच्च रेखाओं को  जाता है यह जरूरी नही है कि सभी वर्ग एक ही माप के रखे जाये । कभी कभी वर्गो की जगह आयत (Rectangle) लिये जाते हैं। इस विधि को कभी कभी स्थान तलेक्षण ( spot levelling ) भी कहते है। ( चित्र 6.8 )

2. अनुप्रस्थ तलेक्षण द्वारा ( By Cross - sectioning J :- यह विधि किसी सड़क रेल अथवा नहर के सर्वेक्षण में ज्यादा काम मे लाई जाती है। सड़क रेल अथवा नहर की मध्य रेखा ( Centre line ) के अभिलम्ब कई अनुप्रस्थ काट लिये जाते है और उन पर स्थित कई बिंदुओं की ऊंचाई लेवल व गज द्वारा ज्ञात की जाती है। रेखाओं के बीच की दूरी जमीन का स्वरूप, समोच्च रेखान्तर व सर्वेक्षण के उद्देश्य पर निर्भर करती है। असम जमीन पर या काठी अथवा घाटी में ये रेखाएँ पास पास लेनी चाहिए।

नक्शा बनाते समय समोच्च रेखाओं का अन्तर्वेशन यह मान कर किया जाता है कि किन्ही दो रेखाओं पर स्थित संलगन बिन्दुओं के बीच ढाल एकसार है चित्र(6.9) में गहरे बिंदु वे है जिनका सर्वेक्षण किया गया है।


3. टैकियोमीटर विधि द्वारा (By Tacheometric Method):- पहाडी व पर्वतीय इलाको में टैकियोमीटर विधि ज्यादा उपयोगी रहती हैं। टैकिलोमीटरी विधि को एक ऐसे स्टेशन पर स्थापित किया जाता है जहाँ से ज्यादा से ज्यादा क्षेत्र का सर्वेक्षण किया जा सके। उपकरण स्टेशन से चुम्बकीय याम्योत्तर या अन्य किसी स्वेच्छ याम्योत्तर के सन्दर्भ में कई त्रैज्य रेखाएँ ली जाती है ; चित्र .... .. हर त्रैज्य रेखा (Radial line)पर रखकर टैक्योमीटरी प्रेक्षण लिये जाते है ।
क्षैतिज व ऊर्ध्वाधर दूरियाँ निम्न सुत्रो से ज्ञात कि जाती हैं,
D=kscos²∅+c.cos∅   नोटः-(∅= थीटा )

V=Dtan∅
    जहाँ k = उपकरण के स्थिरांक
      ∅= दृष्ट रेखा का क्षैतिज के साथ नतिकोण ।
S र्‍ गज पाठ्‌यांक अन्तर (Staff intercept)
त्रैज्य रेखाओं पर बिन्दु इस लिए जाते है कि किन्ही दो संलग्न बिन्दुओं के बीच ऊंचाई अन्तर समोच्च रेखान्तर से कम हो | यदि क्षेत्र बड़ा हो और चारों ओर पहाड़ियों आदि से घिरा हो तो एक टैकियोमीटरी मालारेखा द्वारा सर्वेक्षण किया जाता है। मालारेखा के स्टेशन ऊंचाइ के बिन्दुओं पर किये जाते है जहाँ से ज्यादा से ज्यादा क्षेत्र का सर्वेक्षण किया जा सके । हर मालारेखा स्टेशन पर कई त्रैज्य रेखाएँ ली जाती है। बाद में मालारेखा त्रैज्य रेखाएँ व बिंदुओं का आलेखन किया जाता है। और अन्तर्वेशन द्वारा समोच्च रेखाएँ बनाई जाती है। 
( चित्र 6 .10 एव 6 .11 )




समोच्च रेखाओं का अन्तर्वेशन(Interpolation of Contours). :-

परोक्ष विधि से निर्देश बिन्दुओं के सर्वेक्षण के बाद उनका आलेखन किया जाता है और फिर अन्तर्वेशन द्वारा समोच्च रेखाएँ नक्शे पर बनाई जाती है । अन्तर्वेशन इस धारणा पर आधारित है कि किन्ही दो संलग्न बिंदुओं के बीच जमीन का ढाल एकसार है।
अन्तर्वेशन की निम्न मुख्य विधियाँ हैः-

i . अनुमान से अन्तर्वेशन

ii . गणितीय गणना से अन्तर्वेशन

iii . लेखाचित्रीय विधि से अन्तर्वेश


i . अनुमान से अन्तर्वेशन(Interpolation by Estimation):- इस विधि में सर्वेक्षण किये हुए निदेश बिन्दुओ के बीच समोच्च रेखा के बिंदुओं की स्थिति अनुमान से ज्ञात की जाती है। अत: यह विधि छोटे एवं साधारण कार्य मे ही उपयुक्त रहती है ।

ii . गणितीय गणना से अन्तर्वेशन (Interpolation by Arithmetic):- यह परिशुद्ध विधि है , किन्तु इसमें समय ज्यादा लगता है। निर्देश बिन्दुओं के बीच समोच्च बिन्दुओं की स्थिति गणितीय गणना से ज्ञात की जाती है। ( चित्र 6.12)

iii . लेखाचित्रीय विधि (Graphical Method ) :- लेखाचित्रीय विधि मे एक अनुरेखण कागज(Tracing paper)  या अनुरेखण कपड़े की सहायता से अन्तर्वेशन किया जाता है। .


इसकी दो विधियाँ हैं। जो निम्नलिखित है : -


i . पहली विधि :-





ii . दूसरी विधि :-





समोच्च रेखाओं का रेखण ( Contour Drawing ) :- कई निर्देश बिन्दुओं के ताने -  बाने के बीच समोच्च बिन्दुओं के अन्तर्वेशन के बाद , समोच्य रेखाओं को उनके तद्नुरूपी बिंदुओं से खींचा जा सकता है। इन रेखाओं का रेखण करते समय उनकी विशिष्टताएँ ध्यान में रखनी चाहिए । समोच्च रेखाओं को काली या भूरी ( Brown ) स्याही से बनाया जाता है। यदि समोच्च नक्शे पर सड़क, नहर या अन्य आकृतियाँ भी बनानी हो तो इनको काली स्याही से बनाना चाहिए । व समोच्च रेखाओं को भूरी स्याही में बनाना चाहिए। समोच्च रेखाओं पर ऊचाई का मान तरतीब से लिखना चाहिए ।

समोच्च ढाल या ढाल रेखा ( Contour Gradient or Grade line ) :- समोच्च ढाल एक ऐसी रेखा है, जो सम्पूर्णत: जमीन पर रहती है और जिसका क्षैतिज के साथ नतिकोण पूरी लम्बाई में एकसार रहता है। यदि ऐसी रेखा का ढाल दिया हुआ हो तो किसी बिंदु से इसकी दिशा नक्शे पर या जमीन पर आसानी से लगाई जा सकती है। जमीन पर समोच्च ढाल की लगाने के लिए एक क्लिनोमीटर , लेवल या थियोडोलाइट की आवश्यकता होती है ।


समोच्च नक्शे के उपयोग ( Uses of Contour Maps ) :- समोच्च नक्शे के कुछ मुख्य उपयोग नीचे दिये जा रहे है।

1. किसी भी दिशा में जमीन का काट बनाना (Drawing of section along and direction) :- समोच्च नक्शे पर किसी भी दिशा में जमीन का स्वरूप जानने के लिए उसका काट ब बनाया जा सकता है। उसी ताह किसी सड़क , रेल या नहर की दिशा में जमीन का अनुदैर्ध्य पार्श्व चित्र बनाया जा सकता है । जो इनके निर्माण में काम आता है। ( चित्र 6.15 )




2. दो बिन्दुओं के बीच अन्तरदृश्यता ज्ञात करना (To Determine the Intervisibility between two points ) :- त्रिकोणीय सर्वेक्षण मे स्टेशनों के बीच की दूरी बहुत ज्यादा होती है , अत: उनके चयन के पहले उनके बीच अन्तरदृश्यता ज्ञात करना अत्यन्त आवश्यक होता है । त्रिकोणीय स्टेशन के बीच अन्तरदृश्यता ज्ञात करने के लिए समोच्च नक्शा बहुत उपयोगी होता है। ( चित्र 6.16 मे दर्शाया गया है )

Contour surveying





3. समोच्च ढाल को लगाना व मार्ग की स्थिति निर्धारित करना (Tracing of contour gradients and location of route) :- समोच्च नक्शा किसी सडक या रेल मार्ग, नहर या अन्य किसी संचार रेखा की स्थिति निर्धारण करने के लिए बहुत प्रयोग में लाया जाता है। ( चित्र 6.17 में प्रदर्शित किया गया है । )

Contour surveying




4. वाह क्षेत्र को मापना (Measurement of Drainage area ) :- किसी नदी में किसी एक बिंदु पर वाह क्षेत्र वह तमाम क्षेत्र है जहाँ से पानी बहकर उस बिन्दु तक आता है । इस जल निकास क्षेत्र को बाकी क्षेत्र से बाँटने वाली रेखा को समोच्च नक्शे से ज्ञात की जा सकती है।  क्षेत्र की सीमा बनाने वाली रेखा की निम्न विशेषताएँ होती है ( इसको चित्र 6.18 मे प्रदर्शित किया गया है। )

1 . यह रेखा उन सब काठियो (Redges or saddles ) से गुजरती है जो वाह क्षेत्र को दूसरे क्षेत्र से अलग करती है। 
2. यह अक्सर काठियाँ के साथ - साथ चलती है ।
3. यह हमेशा समोच्च रेखाओं के अभिलम्ब रहती है। इस रेखा को जल विभाजक रेखा ( watershed line ) कहते है ।

Contour surveying




5. जलाशय की धारिता ज्ञात करना (Determination of Reservoir Capacity  ) : - समोच्च नक्शे की किसी जलाशय की धारिता की संगणना की जा सकती है।



Contour surveying







Total station objective 2023question

 1. टोटल स्टेशन द्वारा किस घटक का मापन किया जाता है ? (a) दूरी                      ( b ) कोण ( c ) क्षेत्रफल              (d) उपरोक्त सभी 2...