प्रिय पाठको हम आपके लिए सर्वेयर 2 year के Curve ( वक्र ) पाठ के महत्वपूर्ण नोट लाए है। जो आपके Exam के लिए महत्वपूर्ण है। कृपया आप लोग और नोट के लिए हमारे Blogg post को Follow कर लें । धन्यवाद | | चलिए पाठ शुरू करते है।
Note : यहां पर लाल रंग से लिखे गए बिंदु प्रश्न है |
CURVES ( वक्र) :- वक्र आमतौर पर संचार की रेखा में नियोजित होते हैं ताकि सीधि रेखा के चौराहे पर दिशा परिवर्तन क्रमिक हों।
वक्र मुख्यतः तीन प्रकार के होते है।
1. वृत्ताकार वक्र(Circular Curve)
2. परवलयाकार वक्र(Parabolic Curve)
3. सर्पिलाकार वक्र(Spiral Curve)
1. वृताकार वक्र(Circular Curve) :- मुख्यत : तीन प्रकार के होते है ।
i. सरल वृत्ताकार वक्र (Simple Circular Curve)
ii. यौगिक वृत्ताकार व्रक (Compound Circular Curve)
iii. उत्क्रम वृत्ताकार वक्र(Reverse Circular Curve).
## सरल वक्र की परिभाषाएं एवं आधारभूत पद (DEFINITIONS AND BASIC TERMS FOR SIMPLE CURVE )##
1. पश्च स्पर्श रेखा (Back tangent ) :- सर्वेक्षण कार्य की प्रगति की दिशा में वक्र की प्रारम्भिक बिंदु ( Initial point) पर जो स्पर्श रेखा होती हैं । उसे पश्च या पिछली स्पर्श रेखा कहते है।
2. अग्र स्पर्श रेखा ( Forward tangent ) :- सर्वेक्षण कार्य की प्रगति की दिशा में वक्र के समापन बिंदु ( End point ) पर जो स्पर्श रेखा होती है उसे अग्र स्पर्श रेखा कहते है ।
3. प्रतिच्छेद बिंदु ( Point OF Intersection ) :- जब दोनो स्पर्श रेखा आगे बढाया जाए तो वे एक बिन्दु पर आपस में काटती है। यह बिंदु प्रतिच्छेद बिंदु कहलाता है। इसे संक्षेप में P .I भी कहते है ।
4. वक्र बिंदु ( curve points) :- वक्र बिंदु वह बिंदु होता है जहां पश्च स्पर्श रेखा , वक्र से मिलती है । इसे संक्षेप में P.C ( Point of curve ) भी कहते है |
5. स्पर्श बिंदु ( Tangency point) :- इसे अग्र स्पर्श बिंदु भी कहा जाता है । यह वह बिपु होता है, जहां अग्र स्पर्श रेखा वक्र के साथ मिलती है। इसे P .T कहा जाता है ।
6. प्रतिच्छेद कोण ( Intersection angle ) :- दोनो स्पर्श रेखा के द्वारा किसी बिंदु पर बना कोण प्रतिच्छेद कोण कहलाता है ।
7. विक्षेप कोण ( Deflection angle ) :- किसी बिंदु का विक्षेप कोण वह कोण होता है जो पश्च स्पर्श बिंदु पर पश्च स्पर्श रेखा व उस बिंदु तथा पश्च स्पर्श बिंदु को मिलाने वाली जीवा ( chord) फे मध्य बनता है । इसे ∆ से दर्शाया जाता है ।
8. स्पर्श रेखा दूरी ( Tangent distance) :- यह वह दूरी होती है , जो स्पर्श बिंदु व प्रतिच्छेद बिन्दु के बीच होती है इसे T के द्वारा दर्शाया जाता है।
T = Rtan∆ / 2
9. बाह्य दूरी ( External distance) :- वक्र के मध्य तथा प्रतिच्छेद बिंदु के बीच की दूरी को बाह्य दूरी कहते है। इसे E से दर्शाया जाता है ।
शीर्ष दूरी(Apex distance) E=Rtan∅/2
या,E = R( sec∆/2-1)
10. वक्र की लम्बाई ( Length of Curve ) :- पश्च स्पर्श बिन्दु तथा अग्र स्पर्श बिंदु के बीच वक्र की लम्बाई को वक्र लम्बाई कहा जाता है, इसे l के द्वारा दर्शाया जाता है ।
l=R.∆(∆ in radians)
l=R.∆π/180°(∆ in degree)
l=π∆R/180°
11. दीर्घ जीवा ( Long chord ) :- पर्श्च स्पर्श बिंदु व अग्र स्पर्श जिस रेखा द्वारा मिलते है , उसे दीर्घ जीवा कहते है । इसे ( L) के द्वारा दर्शाया जाता है।
sin∆/2=L/2R
L=2Rsin∆/2
12. सामान्य जीवा ( Normal chord ) :- वक्र पर लगाए गए दो क्रमिक नियमित स्टेशन बिन्दुओं के मध्य की दूरी , सामान्य जीवा कहलाती है । इसे C से सूचित किया जाता . है।
13 . उप - जीवा ( Sub - chord) :- सामान्य जीवा से छोटी लम्बाई की जीवाओं को उप - जीवा कहते हैं ।
14 . मध्य कोट्यांक ( mid ordinate ) : - दीर्घ जीवा के मध्य बिंदु तथा वक्र के मध्य बिंदु को मिलाने वाली रेखा को . मध्य कोट्यांक कहा जाता है । M से दर्शाया जाता है ।
M = R - cos∆/2
या R ( 1 - cos∆/2)
15. दायां हाथ वक्र ( Right hand Curve ) :- इसे दक्षिणवती वक्र ( clockwise curve ) भी कहा जाता है । यह वक्र सर्वेक्षण की दिशा के सन्दर्भ मे बाएं हाथ की दिशा की तरफ मुड़ जाता है।
16. बायां हाथ वक्र ( Left hand curve ) :- इसे वामावर्ती ( Anti clockwise Curve ) कहा जाता है। यह दक्र सर्वेक्षण की दिशा के संदर्भ मे बाएं हाथ की दिशा की तरफ मुड़ जाता है।
17. केन्दीय कोण ( central anglel ) :- वक्र के चाप द्वारा केन्द्र पर बना कोण केन्द्रीय कोण कहा जाता है। इसका मान विक्षेप कोण (∆) के बराबर होता है।
*** किसी वक्र को बनाने के लिए निम्नलिखित अवयवो का ज्ञान होना आवश्यक है ।***
1. वक्र की लम्बाई ( Length of curve )
2. स्पर्श रेखा की लम्बाई ( Length of tangent )
3. दीर्घ जीवा की लम्बाई ( Length of long chord )
4. बाह्य दूरी अथवा शीर्ष बिंदु दूरी ( Apex or Enternal distance )
5. मध्य कोट्याक (Mid - ordinate )
**वक्र के पदनामों ( DESIGNATIONS) को दो प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है।**
1. वक्र की त्रिज्या ( Radius of Curvature )
2. वक्रांश ( Degree of Curvature )
1. वक्र की त्रिज्या ( Radius of Curvature ): - पहली विधि मुख्यत: ब्रिटिश में अधिक प्रचलित है , जबकी दूसरी विधि भारत , अमेरिका , कनाडा तथा कई दूसरे देशों में प्रचलित है। पहली विधि को 40 मीटर वक्र या 70 मीटर वक्र द्वारा प्रदर्शित करते हैं , जो यह बताता है की त्रिज्या 40 मीटर या 70 मीटर है। दूसरी विधि में वक्र को 8° वक्र द्वारा प्रदर्शित करते है। यह विधि भारत में सबसे ज्यादा प्रयोग की जाती है।
2 . वक्रांश ( Degree of Curvature ) :- निश्चित लम्बाई की जीवा द्वारा या चाप द्वारा वक्र के केन्द्र बिंदु पर बना कोण वक्रांश कहलाता है। इस विधि के अनुसार वक्र को 1°,2°,3° आदि से अंकित किया जाता है। FPS प्रणाली में 100 फीट लम्बे चाप या जीवा द्वारा वक्र के केन्द्र पर बना कोण वक्रांश कहलाता है। जबकी MKS प्रणाली में 20 मीटर की चेन को मानक चेन मानकर 20 मीटर के चाप द्वारा वक्र के केन्द्र पर बना कोण वक्रांश कहलाता है। इसे ' D ' द्वारा दर्शाया जाता है।
6.सरल वक्र खीचनें या निशानबंदी की विधियां
= किसी क्षेत्र में सरल वक्र खीचने के लिए कई बिंद बनाएं . जाते है। इन बिंदुओं के मिलाने से वांछित वक्र प्राप्त होता है। इन बिंदुओं का स्थापन ही वक्र की निशान बन्दी कहलाती है।
सरल वक्र की निशानबंदी की विधियों की उपयोग में लाए जाने वाले उपकरणों के आधार पर दो भागो में विभाजित किया जा सकता है -
1 . रैखिक विधियां ( LINEAR METHODS )
2. कोणीय विधियां ( ANGULAR METHODS )
1. रैखिक विधियां ( Linear Methods ):- रैखिक विधि में जरीब या फीते का ही प्रयोग किया जाता है , अन्य किसी कोणमापी यंत्र को काम मे नही लिया जाता है। ये विधियां छोटी लम्बाई एवं कम परिशुद्धता वाले वक्रो की निशानबंदी हेतु प्रयोग की जाती है।
सरल वक्र की निशानबंदी के लिए निम्नलिखित रैखिक विधियां प्रयोग की जाती हैं।
(i ) दीर्घ जीवा से कोटियां या खसके नाप कर
( ii ) वक्र के चापों के क्रमिक समद्धिभाजन द्वारा
(iii ) स्पर्श रेखा द्वारा खसके नाप कर
( iv ) बढ़ाई गई जीवाओं से खसके या विक्षेप दूरियां नाप कर |
(2) . कोणीय विधियां ( Angalar Methods ) :- निशानबंदी की इस विधि में केवल नापी यंत्र जैसे थियोडोलाइट का उपयोग किया जाता है ।
सरल वक्र को थियोडोलाइट की सहायता से बनाने की विभिन्न विधियां इस प्रकार है।
(i) . रैंकिग की विक्षेप कोण विधि ( Rankine 's methods of deflection )
( ii) . दो थियोडोलाइट विधि ( Two theodolite Methods )
(iii) . टैक्योमीट्रिक विधि ( Tacheometric Methods )
*यौगिक वक्र ( COMPOUND CURVE) :- दो या दो से अधिक वृत्तो के चापों से बना वक्र यौगिक वक्र कहलाता है।
अर्थात् यह एक ही दिशा में घूमते हुए एक से अधिक त्रिज्याओं का एक सतत वक्र होता है।
**उत्क्रम वक्र ( REVERSE CURVE):- उत्क्रम वक्र दो वृत्तो के चापों से बनता है जिनके केन्द्र उभयनिष्ठ रेखा के दोनो तरफ होते है। इन दोनो वृत्तो के चाप एक ही त्रिज्या के या अलग -अलग त्रिज्या के होते है। ये वक्र उन परिस्थितियों मे उपयोग में लाए जाते है, जब दो सीधी रेखाएं जिन्हे वक्र में जोड़ना है, या तो एक दूसरे के समानान्तर हो या इनमें कोण बहुत छोटा हो। ऐसी परिस्थिति में जहां सड़को अथवा रेलों पर गति बहुत तेज होती है , वहां इस वक्र का प्रयोग नही करना चाहिए ।
उत्क्रम वक्र के दोनो वक्र दो भिन्न दिशाओं की ओर मुड़ते है तथा उनके मिलन बिंदु पर एक उभयनिष्ठ रेखा होती है। दो वक्रो का यह मिलन बिंदु , उत्क्रम वक्र बिंदु (Point of reverse curvature) कहते है । इस P.R.C. में त्यक्त करते है।
उत्क्रम वक्र निम्नलिखत कारणों से नही लगाना चाहिए ।
(1) .वक्र के उत्क्रम बिन्दु पर एकदम से वक्र में बाहरी उठान ( super elevation ) उल्टी दिशा में नही दिया जा सकता है।
( 2) . उत्क्रम वक्रता बिंदु पर एक तरफ से दूसरी तरफ , पथ के झुकाव ( cant ) को आकस्मिकता से बदलना आवश्यक हो जाता हैं।
( 3 ) दिशा में आकस्मिक परिवर्तन होने के कारण यात्रियों को बहुत असुविधा होती हैं।
(4). वक्र के उत्क्रम बिंदु पर सड़क या रेल किनारे को ऊंचा करने की सुविधा नही रहती है।
(5). उत्क्रम वक्रता बिंदु पर ड्राइवर के लिए स्टियरिंग संभालना बहुत कठिन होता है। ड्राइवर को सावधान रहना पड़ता है। अन्यथा दुर्घटना की संभावना रहती हैं।
***संक्रमण वक्र ( TRANSITION CURVE) :- ऐसा वक्र जिसकी वक्रता त्रिज्या, वक्र के प्रत्येक बिंदु पर बदलती रहती है, संक्रमण पक्र कहलाता है।
इसे मुख्यत : सीधी रेखा को एक साधारण वक्र या एक यौगिक वक्र के दोनो चापों को जोड़ने के लिए लगाया जाता है ।
जैसेः- सड़क पर वाहन के मुड़ते समय ऐसा अनुभव होता है कि गाड़ी सड़क से बाहर फैंका जा रहा है ( अपकेन्द्रिय बल के कारण) । इसलिए सीधी सड़क व वृत्ताकार वक्र के मध्य संक्रमण वक्र लगा दिए जाते है ' तो वाहन के मुड़ने पर कोई झटका महसूस न हो।
** संक्रमण वक्र के उद्देश्य (Purpose of Transition Curve) :-
( 1) .सीधी रेखा को साधारण वक्र से जोड़ने के लिए यह वक्र अनन्त त्रिज्या से साधारण वक्र की त्रिज्या तक होता है। इससे वाहन को सीधी सड़क से वक्र पर जाने में झटका महसूस नहीं होता है।
( 2 ) . सीधी सड़क पर शुन्य बाह्य उठान होने से साधारण वक्र पर एक निश्चित बाहरी उठान लगाने में मदद मिलती है ।
संक्रमण वक्र के प्रकार (Types of transition) : - संक्रमण वक्र मुख्यत: तीन प्रकार के होते है।
( i ) . लेमिनस्केल ( Leminscale )
( ii ) . क्लोथोइड ( clothoid )
(iii ) . क्यूबिक परवलय ( Cubic Parabola )
**संक्रमण वक्रो की स्थापन (SETTING OUT OF TRANSITION CURVE ) :- एक संक्रमण वक्र को निम्नलिखित विधियां से स्थापित किया जाता है :-
1. खसका विधि (OFFSET METHODS)
2. विक्षेप कोण की विधियां (METHODS OF DEFLECTION ANGLES)
ऊर्ध्वाधर वक्र (VERTICAL CURVE) :- ऊर्ध्वाधर वक्र का उपयोग रेल - रोड हाइवे या अन्य रास्तों की दो प्रतिच्छेदी ग्रेड रेखाओं को जोड़ने मे आता है । इनकी सहायता से ऊर्ध्वाधर गति फी समतलता ( smoothnes ) प्रदान कर सकते है ।
हाइवे या रेल - रोड के लिए ग्रेड को दो प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है।
(i ) . प्रतिशत के रूप में, Eg :- 2% , 3% , आदि ।
(ii ) 1 में n ढाल : eg : 1 में 100 , 1 मे 400 आदि ।
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